धरती को समुद्र की चाह नहीं थी
फूलों को काँटों की चाह नहीं थी
दिल इस कदर टूट गया इस इश्क के बाजार में
जैसे मोहब्बत को बेवफाई की चाह नहीं थी
दिल में प्यार का एहसास नहीं हुआ
लवों पे हँसी का एहसास नहीं हुआ
आँखों को नमी का एहसास नहीं हुआ
तेरे दिल ने ऐसी बेवफाई की मेरे दिल से
जिन्दगी को मौत का एहसास नहीं हुआ
दर्द इस कदर बढ़ गया कि आँखें पथरा सी गयी
जिन्दगी इस कदर उलझ गयी कि साँस थम सी गई
ख़ुशी को आने का रास्ता न मिल सका
लवों की हँसी इस कदर थम सी गयी
गम के साये में कब तक मातम मनाते रहें
झूठ के साये में कब तक जिन्दगी बिताते रहें
जिंदगी को भी मौत का इंतजार नहीं रहा
फिर किस आस पे ख़ुशी को अपना बनाते रहेंअराधना कुलश्रेष्ठ